Saturday, 5 January 2019

India vs. Bharat इण्डिया बनाम भारत

क्यों न हम सब भारतीय अपने राष्ट्र को केवल "भारत" नाम से ही सम्बोधित करें? हमारा राष्ट्र हिन्दी में भारत और अंग्रेजी में इण्डिया (India) के नामों से जाना जाता है। इण्डिया नाम की उत्पत्ति सिन्धु नदी के अंग्रेजी नाम "इण्डस" से हुई है, जो केवल एक भौगोलिक क्षेत्र का द्योतक है। इंण्डिया नाम पश्चिमी राष्ट्रों का दिया हुआ है जबकि "भारत" नाम, राजा भरत के नाम से प्रचलित है। राजा भरत प्राचीन भारत के चक्रवर्ती सम्राट थे जो कि हस्तिनापुर के राजा दुष्यन्त तथा रानी शकुन्तला के पुत्र थे।


भारत नाम इस राष्ट्र की मूल सांस्कृतिक सभ्यता, चेतना, और रीति रिवाज का सही प्रतीक है। संस्कृत के भारत (भा + रत) शब्द का अर्थ है वह जो आन्तरिक प्रकाश या विदेक-रूपी प्रकाश मे अनुरक्त या समर्पित हो। वह जिसने ब्रम्ह चैतन्य या परम तत्व का ज्ञान कर लिया हो। आदि काल के भारत के ऋषि मुनियों के साथ साथ आम नागरिक भी आत्म चिन्तन और आत्म ज्ञान के चरम प्रकाश के प्रति समर्पित हुआ करते थे। यह उनके जीवन जीने का ध्येय, प्रमुख उद्देश्य ओर तरीका हुआ करता था, जो सत्य पर आधारित हुआ करता था। ऐसे विशाल और गुढ़ अर्थ वाला शब्द ही इस राष्ट्र का सही और उचित नाम हो सकता है।

जब यह सत्य है कि भारत जमीन का एक टुकड़ा नही है, बल्कि इस राष्ट्र की सास्कृतिक सभ्यता से जुड़ा हुआ गहन अर्थ को दर्शित करने वाला नाम है, तब क्यों न हम उधार के शब्द इंण्डिया नाम का प्रयोग बंद कर दे और केवल अपनी मूल सभ्यता के अपने नाम भारत शब्द का ही उपयोग करें। फ्रांस, जर्मनी, रशिया, जापान, चीन जैसे अन्य किसी विकसित राष्ट्र ने न तो अपना नाम बदला है और न अपनी भाषा। हम भारतीय ही क्यों अपनी गुलामी के प्रतीक राष्ट्र के नाम और अंग्रेजी भाषा को अपनायें हुए है?

क्यों न हम भारतीय संविधान से India नाम हटा दें और भारत को केवल भारत के नाम से ही संबोधित करें।

इस विषय पर चिन्तन जरूर होना चाहिए।

Friday, 30 November 2018

दिल्ली में किसान मोर्चा

कल से दिल्ली में दो दिन का किसान आंदोलन शुरु है। आजयह आंदोलन भारतीय संसद के दरवाजे पर पहुंचने वाला है। रामलीला मैदान में हजारों किसान धरने पर है। फिर नेताओं का जमावड़ा कैसे पीछे रह सकता है। और ये ही लोग किसानों का जमावड़ा भी इकट्ठा कर सकते है। गरीब किसान तो अपना इलाज करवाने शहर तक भी नही जा सकता है। इतने बड़े आंदोलन के लिए पैसा चाहिए, स्पांसर करने वाला चाहिए। पर्दे के पीछे कौन है? कोई न कोई बड़ी ताकतें तो होगी ही।

आश्चर्य कि बात तो यह है कि आज जो नेता इन किसानों के साथ खड़े दिखाई दे रहे है, उनमें से कइयों को लम्बे समय तक सत्ता सुख भोगते हुए देखा गया है। सत्ता सुख तो इन्होंने लम्बे समय तक भोगा है पर देश के किसानों की हालत बद से बदतर होती चली गई। किसान आत्महत्यायें करने पर बाध्य हो गये। हां, फरक पड़ा है इन नेताओं की सम्पति का जो कई गुणा बढ़ी है। अनेकों उदाहरण सभी जानते है। राजनेता अथाह सम्पति के मालिक कैसे बनें? इसका जवाब ये लोग नही देते। किसानों की गरीबी और भूखमरी का उपयोग करना ये लोग भली भांति जानते है। और साढ़े चार साल पहले सत्ता में आये मोदी सरकार को सारा दोष देना यह तो इनका प्रमुख दांव है। जैसे किसानों की सारी समस्यायें मोदी के आने पर ही आई हो। जैसे  देश में इसके पहले देश में किसान मालामाल थे। कोइ आत्महत्या नही करते थे। केवल मोदी ने ही किसान के इतने बुरे दिन पैदा किए।

कुछ विपक्ष के राजनेताओं को और साथ ही बांई विचारधारा के पक्षधरों को तो गरीब अच्छे लगते है। तभी तो इनके "गरीबी हटाओं,  मुफ्त में राशन, मुफ्त में बिजली, मुफ्त में पानी, कर्जा माफी" जैसे अनेकों नारें जन्म ले सकते है और जनता को भिखारी बनाया जा सकता है। अशिक्षा, गरीब और गरीबी तो इनका सबसे बड़ा राजनैतिक हथियार है। तभी तो देश में क्रांति का नारा दिया जा सकता है। यदि न रहेगा बांस तो बंशी कहा से बजेगी? न रहेगा गरीब तो इनकी राजनीति की दुकान कैसे चलेगी? अतीत गवाह है कई बार और कई राज्यों में किसानों का कर्जा माफ किया गया है। कई बार मुफ्त में राशन और बिजली बांटी गई है। पर क्या किसानों की और देश के गरीबों की आर्थिक हालत सुधरी है?

आज किसानों को भीख देने की नही है। जरुरत है, उन्हें सिंचाई के अच्छे साधन, फसल की उचित किंमत और फसल खराब होने पर उचित मुवावजा देने की। साथ ही किसानों को अच्छी स्वास्थ्य सेवा, उनके बच्चों को अच्छी शिक्षा और उचित मुल्यों पर अच्छे बीज और उर्वरक उपलब्ध करवाने की आवश्यकता है।

देश का अन्नदाता जो अपना पेंट भरने के लिए पूरे राष्ट्र का और  राष्ट्र के हर नागरिक का पेंट भरता हो, उसे भूखा रखना और आत्महत्या के लिए मजबूर करना सबसे बड़ा देश का सामूहिक गुनाह और पाप है। यह बंद होना चाहिए। इस पर हर राजनेता और नागरिक को एक होना चाहिए। यह राजनीति का विषय नही है। इस पर राजनीति बंद होना चाहिए।

Monday, 19 November 2018

तुलसी विवाह

कर्म फल से कोई नही बच सकता। देवता भी नही। तुलसी विवाह से प्रचलित कहानी यह बात सिद्ध करती है।



कहानी भगवान राम के जन्म काल से भी पहले की है। उस समय जलन्धर नामक अत्यंत बलशाली राक्षस बड़ा उत्पाती था। उसके उत्पात से देवतागण भी परेशान थे। जलन्धर का वध करना किसी के बस में नही था। इसका कारण था, उसकी पत्नी, वृन्दा का पतिव्रत धर्म। उसके पतिव्रत धर्म के प्रभाव के कारण ही जलन्धर पर विजय पाना किसी के लिए भी अत्यंत कठीन था। इसके उपाय के लिए परेशान देवतागण भगवान श्रीविषणु के पास गये और सहायता मांगी। देवतागणों को बचाने का विष्णुजी को कोई उपाय समझ में नही आ रहा था, सिवाय पतिव्रता वृन्दा का पतिव्रत धर्म भंग करने के।

यह काम भी इतना आसान नही था। छ्ल कपट का सहारा लेना पड़ा। एक योजना के तहत देवताओं ने जलन्धर को युद्ध के लिए ललकारा और उधर भगवान विष्णु जलन्धर का रुप लेकर वृन्दा के पास जा पहुंचे। वहां उन्होंने वृन्दा को छूकर उसका पतिव्रत धर्म भंग किया। उसके परिणाम स्वरुप उसी समय उधर युद्ध में जलन्धर पराजीत होकर मारा गया और उसका सिर कटकर वृन्दा के समक्ष जा गिरा। यह देखकर वृन्दा ने जलन्धर के रुप में सामने खड़े व्यक्ति की पहचान जानना चाहा। वह क्या देखती है, उसके सामने साक्षात विष्णु खड़े थे।  क्रोधित होकर उसने भगवान विष्णु को श्राप दिया। उसने कहा जैसे तुमने छल से मेरे पति की हत्या कर मुझे पति वियोग दिया वैसे ही तुम्हें भी पत्नी वियोग सहना पड़ेगा। तुम्हारी पत्नी का भी छ्ल से हरण किया जायेगा और तुम्हें पत्नी वियोग में तड़पना पड़ेगा। इसके लिए तुम्हें पृथ्वी पर मानव जन्म लेना पड़ेगा। इसके पश्चात वृन्दा अपने पति के शरीर साथ चीता में प्रवेश कर सती हो गई और परमात्मा में विलीन हो गई। वहां एक पौधा निकला जिसे तुलसी का नाम दिया गया। वृन्दा के सतीत्व की याद में ही हर वर्ष तुलसी का विवाह श्री विष्णुजी के साथ किया जाता है।

वृन्दा के श्राप के फलस्वरुप भगवान विष्णु को पृथ्वी पर अयोध्या में राजा दशरथ के पुत्र राम के रुप में मानव अवतार लेना पड़ा। वनवास के समय लंकाधिपति रावण के द्वारा सीता का छ्लपूर्वक हरण किये जाने पर पत्नी वियोग सहना पड़ा।

यह भगवान विष्णु को वृन्दा का श्राप मानें या कर्मफल माने, दोनों एक ही बात है। कर्मफल से किसी का बचना असंभव है। देवताओं के लिए भी नही।

एक कहानी यह भी है कि वृन्दा ने विष्णुजी को उसके साथ छ्ल करने के लिए श्राप दिया था कि तुम पत्थर बन जाओगे। उस पत्थर को शालीग्राम का नाम दिया गया। देवताओं के आग्रह पर वृन्दा ने अपना श्राप वापस लिया और भगवान विष्णु पुनः प्रकट हुए। उन्होंने वृन्दा से कहा कि तुम्हारे सतीत्व का मै सम्मान करता हूं। तुम तुलसी का पौधा बनकर हमेशा मेरे साथ रहोगी। उस समय से हर वर्ष तुलसी का विवाह शालीग्राम के साथ सम्पन्न किया जाता है। इसलिए बिना तुलसी दल के विष्णुजी की पूजा अधूरी मानी जाती है।

आज भी उसी परम्परा की पुनरावृती है। कार्तिक माह की एकादशी को हिन्दु धर्म को मानने वाले तुलसी के पौधे की भगवान शालीग्राम याने श्री विष्णुजी के साथ सम्पन्न करते है।

Tuesday, 13 November 2018

हिन्दु एक चौराहे पर

मै भारत ही नही विश्व के सभी धर्मों के अन्दर गर्भित परम सत्य का आदर करता हूं।सभी धर्मों के अन्दर अच्छाई की मूल भावना ही मेरा धर्म है। "एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति" की कल्पना को स्वीकार करते हुए मै यह मानता हूं कि सभी धर्मों ने देश, काल, और परिस्थिति के अनुसार एक ही सत्य को अलग अलग तरीके से उजागर और परिभाषित किया है। किसी अन्य पर अत्याचार या उसका शोषण कर अपना  या अपने धर्म का हित सिद्ध करना न तो मेरा धर्म है और न ही मेरी प्रवृति है। मै एक हिन्दु हूं जो वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना का आदर और सम्मान करता है। स्वामी विवेकानन्द के द्वारा १८९३ में शिकागो धर्म संसद में कहा था, "मैं उस धर्म से हूं जिसने दुनिया को सहिष्णुता और सार्वभौमिक स्वीकृति का पाठ पढ़ाया है. हम सिर्फ़ सार्वभौमिक सहिष्णुता पर ही विश्वास नहीं करते बल्कि, हम सभी धर्मों को सच के रूप में स्वीकार करते है"। स्वामी विवेकानन्दजी के इस कथन को मै अपना मूल मंत्र मानता हूं।


मुझे विश्वास है, हर एक सच्चा और अच्छा हिन्दु इन्हीं मान्यताओं को लेकर जीता है।

लेकिन आज मुझे बहुत दुख होता है जब अनेकों राजनेता अपने राजनैतिक लाभ और वर्ग विशेष को खुश करने के लिए "हिन्दु" शब्द को रोज घोर अपमानित कर रहे है। हिन्दु आतंकवाद, हिन्दु पाकिस्तान, अच्छा हिन्दु, बुरा हिन्दु, हिन्दु मंदिर में लड़किया छेड़ने जाते है आदि अनेकों शब्दों का उपयोग कर हिन्दुओं को अपमानित करते है। इनमें कई लोग हिन्दु ही है और कुछ लोगों की विडंबना यह है कि वोट के फायदे के लिए वे वेशभूषा बदल कर हिन्दु होने का ढोंग रचाते है। पता नही ऐसे बनावटी हिन्दु अच्छे या बुरे हिन्दुओं की श्रेणी में आते है। भारत एक हिन्दु बहुल देश है। क्या हिन्दुओं और हिन्दु धर्म को बदनाम और कमजोर करने की यह इन  राजनेताओ की साजीश तो नही है? क्या जिस धर्म ने विश्व को सहिष्णुता और सार्वभौमिक स्वीकृति का पाठ पढ़ाया है, उसे कमजोर कर खत्म करने की कोई विश्व स्तरीय योजना कार्यरत है? यदि ऐसा नही तो ऐसे वक्तव्य क्यों आते है? क्यों हिन्दु धर्म की मूल भावना और अच्छाई को शिक्षा से १९४७ के बाद दूर रखा गया है। क्यों शिक्षा में गीता और रामायण जैसे हिन्दुओं के ग्रंथों को कोसों दूर रखा गया है। धर्म निरपेक्षेता के नाम पर इन ग्रंथों में निहित नैतिक मूल्यों को क्यों शिक्षा में स्थान नही दिया गया। क्यों भारत के आदि काल से चली आ रही नैतिक  शिक्षा को खत्म किया गया है? आज हिन्दुओं की आस्था के प्रतीक भगवान राम को काल्पनिक क्यों बताया जाता है? क्यों हिन्दु धर्म या हिन्दुओं की बात करना आज सांप्रदायिकता मानी जाती है और मुसलमान की बात करना धर्म निरपेक्षता माना जाता है?

ऐसे कई प्रश्न है जो एक सच्चे भारतीय और सच्चे हिन्दुओं के मन में अवश्य आते होंगे। इसके उत्तर हमें ही ढूंढना है। विचार करना है। कल क्या हो किसने देखा पर हिन्दुओं को जागरुक रहने की अवश्य जरुरत है। यदि हम नही संभले तो मुझे डर है कि कहीं हिन्दुओं की उदारता कल उन्हें ही न ले डूबे।

Sunday, 4 November 2018

अयोध्या में राम मंदिर

आज कांग्रेस और सारा विरोध पक्ष अयोध्या में राम मंदिर बनाने के सहयोगी दलों और विशेष तौर पर भारतीय जनता पार्टी को सुप्रीम कोर्ट के सम्मान और मर्यादा की याद दिला रहा है। बात सही है, प्रजातंत्र में संविधान सर्वोपरी है और इसका सम्मान करना हर भारतीय और राजनैतिक दलों का दायित्व ही नही बल्कि कर्तव्य है। लेकिन....

1. उस व्यवस्था में देश की जनता क्या करें जब किसी विवाद को सुलझाने के लिए सत्तर साल से भी ज्यादा लग जाते है। वह अदालत का कैसे सम्मान का दावा कर सकती है जो राम जन्म भूमि विवाद पर तारीख पे तारीख देती रहती है, जबकि कुछ विषयों पर आधी रात को भी दखाजें खोल देती है? जनता इस विराधाभास को कैसे मान लें?

2. अदालत और संविधान के सम्मान का विषय तब कहां चला गया था जब इलाहाबाद हाइकोर्ट के फैसले को कांग्रेस पार्टी ने नही माना  जिसमें स्व. प्रधान मंत्री को अपदस्थ किया गया था और बाद में देश को इमरजेंसी के दौर का सामना करना पड़ा?

3. अदालत और संविधान के सम्मान का विषय तब कहां चला गया था जब शाह बानो केस में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को कांग्रेस काल में पूर्व प्रधान मंत्री स्व. राजीव गांधी ने कोर्ट उलट दिया था?

गलत परिपाटी की नींव तो कांग्रेस ने रची। आज वह ज्ञान बांट रही है। लेकिन इसके अध्यक्ष आज हिन्दु वोट के लिए जनेउधारी शिवभक्त हिन्दु बनकर मंदिर मंदिर भटक रहे है, कल राम मंदिर बनाने का क्या विरोध कर पायेंगे? यह निर्णय उन्हें दलदल और खाई चुनने जैसी चुनौती से कम नही होगा।


भारतीय जनता पार्टी के लिए तो यह परीक्षा की घड़ी है ही। एक तरफ वह सत्ता में होने से उसके हाथ संविधान से बंधे है तो दुसरी तरफ हिन्दु समाज और संगठनों का उस पर राम मंदिर बनवाने के लिए  दबाव बढ़ता जा रहा है। तीसरी तरफ राजनीतिक दृष्टि से राम मंदिर उसके लिए हमेशा एक मुद्दा रहा है और लोकसभा चुनाव समीप होने से राम मंदिर का निर्माण उसके लिए फायदेमंद हो सकता है।

जो भी हो, इतिहास की विरासत तो वर्तमान को झेलना ही पड़ता है।

Monday, 29 October 2018

शांतता! कोर्ट शुरु है


भारत में राम जन्म भूमि  एक ऐतिहासिक हिन्दु-मुस्लिम विवाद रहा है। इतिहासकारों का कहना है कि सन् 1१५२८ में बाबर नामक बाहरी आक्रमक ने अयोध्या में राम मंदिर तोड़कर वहां एक मस्जिद बनाई थी, जिसे बाबरी मस्जिद के नाम से जाना गया। कहते है सन् १८५३ में हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच इस जमीन को लेकर पहली बार विवाद हुआ था। तबसे किसी न किसी रुप में यह विवाद चलता रहा। स्वतंत्रता के बाद इस विवाद का राजनीतिकरण भी शुरु हो गया, जिसके पक्ष और विपक्ष में राजनीति करने से कोई भी राजनीतिक दल नही बचा। नवंबर १९८९ में कांग्रेस पार्टी के पूर्व प्रधान मंत्री राजीव गांधी ने हिंदु संगठनों को विवादित स्थल के पास शिलान्यास की इजाजत दे दी थी। कांग्रेस सरकार का ये फैसला हिंदू वोट बैंक को अपनी तरफ आकर्षित करने के लिए माना गया। बाद में भारतीय जनता पार्टी के लालकृष्ण अडवानी के नेत्रत्व में एक बड़े राम मंदीर आन्दोलन ने रुप लिया। ६ दिसम्बर १९९२ को हिन्दु कार्यकर्ताओं ने अयोध्या में बाबरी मस्जिद गिरा दी, जिसमें भारतीय जनता पार्टी की प्रमुख भूमिका रही थी। परिणाम स्वरूप देश में व्यापक पैमाने पर दंगे हुए जिसमें करीब दो हजार लोगों की जानें गईं। मामला बाद में न्यायालय पहुंचा। लम्बे समय के बाद सन् २०१० में इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने निर्णय सुनाया था जिसमें विवादित भूमि को रामजन्मभूमि घोषित किया गया। इस फैसले को उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी गई थी और बाद में तय हुआ था कि ५ दिसंबर २०१७ से इस मामले की अंतिम सुनवाई शुरू की जाएगी।


उसके बाद तारीख पे तारीख का क्रम जारी है। सुना तो था कि आज से राम जन्म भूमि पर रोज सुनवाई होगी। पर रोज सुनवाई तो दूर, केवल दो मिनट में ही सिर्फ एक नई तारीख, वह भी जनवरी की दे दी गई।

कपिल सिब्बल ने झ्स विवाद को 2019 के बाद तक टालने की कोर्ट में अर्जी दी थी। क्या उस अर्जी की दिशा में ही परिस्थिति मोड़ नही ले रही है? क्या इस फैसले ने भारत की जनता को फिर से राम जन्म भूमि पर मंदीर बनाने और न बनाने के मुद्दे में पुनः उलझा तो नही दिया? क्या यह कोई षडयन्त्र तो नही है? क्या भारतियों को विकास के एजेंडा से दूर रखने का यह एक राजनैतिक प्रयास तो नही है?

यह भी सही है कि रोहिंग्यों/बांग्लादेशियों/पादरियों/आतंकियों/नक्सलियों के लिए कई प्रशान्त भूषण और कपिल सिब्बल जैसे वकील पैदा हो जाते है। क्या हिन्दुओं के मामलों में कोई प्रशान्त भूषण और कपिल सिब्बल  नहीं है!

आज का फैसला हिन्दुओं के धीरज की परीक्षा जरूर लेगा।  २०१९ के आम चुनाव को देखते हुए इस विवाद का पुनः राजीतिकरण भी होगा। ओवैसी जैसे लोग तुरन्त कूद पड़े और सरकार को धमकी दे रहे है कि यदि हिम्मत हो तो राम मंदिर बनाने पर अध्यादेश लेकर आए। इसके पहले कांग्रेस नेता शशि थरूर ने कहा था कि अच्छे हिन्दु नही चाहते कि अयोध्या में राम मंदीर बने। नए नए जनेउधारी शिवभक्त हिन्दु राहुल गांधी क्या ऐसे अच्छे हिन्दु बन पायेंगे ? रही बात भारतीय जनता पार्टी की उसका तो राम मंदिर का निर्माण हमेशा एक मुद्दा रहा है। "कसम राम की खाते है, मंदिर वही बनायेंगे" यह उनका नारा रहा है। क्या वे २०१९ के पहले राम मंदीर बनाने के लिए अध्यादेश ला पायेंगे? उनकी भी यह परीक्षा की घड़ी होगी।

यदि हां, कोर्ट यदि जल्दी फैसला दे देता तो शायद इस विवाद के  राजनीतिकरण से बच सकता था और शायद कोर्ट का फैसला पक्ष और प्रतिपक्ष दोनों को स्वीकार्य हो सकता था।

लेकिन, शांतता! कोर्ट शुरु है।

Thursday, 25 October 2018

Caged Parrot

The shake up in CBI has shaken up the country and politics is going to be on the boil till next big explosion.

The shake up is either a clean up operation of certain dirty games being played by it in collaboration with some high & mighty in opposition or it's an action to suppress certain wrongs by the present government.

I believe the first one to be more likely as the history of the desperate opposition on the corruption is well known. Unfortunately, it does not smell well.

Being in power for the longest period, it is much easier to assume that Congress has nourished many sympathizer in the beaurocracy and has developed an eco-system favourable to it. Many people in this class may also not be happy with the Modi government as the buzz word of the present government is accountability and good governance. Such eco system will not be liked by the corrupt lot.



We all remember that the Supreme Court in 2013 had denounced the CBI as a "caged parrot" and "its master's voice" when the government was headed by UPA.

Rahul Gandhi's recent revelation on the shake up is noteworthy and is being questioned by experts. How come he knew that CBI's no.1 was  probing Rafale deal and that's the reason for sending him on leave?

Is it not more likely that the government's mid night action on CBI was aimed at checkmating the opposition's game plan?

Hope the facts will be revealed through the fair investigation. With this perspective, the decision taken by the government to send the CBI's no. 1 & 2, both on leave appears to just and right.

India vs. Bharat इण्डिया बनाम भारत

क्यों न हम सब भारतीय अपने राष्ट्र को केवल "भारत" नाम से ही सम्बोधित करें? हमारा राष्ट्र हिन्दी में भारत और अंग्रेजी में इण्डिया (...